कोशिशें बहुत की हमने
उन्हें समझाने की,
पर उन्हें कहां कुछ समझना था।
कैसे बताते हाल-ए-दिल उन्हें,
उन्हें तो दुश्मनों से मिलना था ।।
ख्वाहिशों का दामन भी अब छूट चला है,
वो दोस्त भी अब मेरा रूठ चला है ।
न चाह कर भी एहसास तेरी दोस्ती का,
अब मेरा दिल छोड़ चला है ।।
यूं तो तेरी दोस्ती के लिए
समंदर भी कम था ।
फिर भी न जाने
तुझे क्या ग़म था ।।
नफरतों का आलम इतना गहरा हो गया,
कि हर एहसास उसमें डूब गया ।
गैरो से ज्यादा चोट अपनों ने दी,
हर रिश्ते से विश्वास उठ गया ।।
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