पर तू नजर नहीं आ रही थी।
नाउम्मीदी में फिर पलट गए घर की ओर,
देखा तो तू घर में ही थी।।
हर वक्त मेरे सामने ही रहती थी,
हर पल मेरे साथ ही थी।
तुझको जान न सका, पहचान न सका,
शायद आंख मेरी खुलनी बाकी थी।।
जब धूप होती थी थोड़ी तेज,
तो तू आंचल बन जाती थी।
जब हवाएं होती थी विकराल,
तो तू ढाल बन जाती थी।।
जलती थी जब जिंदगी मेरी आग की तरह,
तो तू शीतलता बन जाती थी।
जब प्यास रह जाती थी अधूरी मेरी,
तो तू नीर बन जाती थी।।
पर जाने तू थी कहां,
कभी नजर आई नहीं।
एहसास तेरा हर वक्त रहा,
पर तू दिखाई दी नहीं।।
जब भी नजर उठती थी,
चार दीवार और मै था।
एक खामोश सन्नाटा,
हर वक्त छाया रहता था।।
खामोशी का ये मंजर,
बड़ा जानलेवा था।
नजर कुछ नहीं आ रहा,
एक भयानक अंधेरा था।।
फिर किसी ने,
दीप एक जलाया कोई।
छटा अंधियार हुआ उजाला,
एक रोशनी सी आई कोई।।
चारों ओर दिखने लगा था,
आंखों में चमक सी आई।
हमें भी लगा,
अब भोर हुई, अब भोर हुई।।
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