Wednesday, February 21, 2024

थोड़ा सोच कर बोलें

क्या आवश्यकता है हर जगह बोलने की? क्या आवश्यकता है हर बात से स्वयं को जोड़ने की?

इतिहास साक्षी है कि जब जब भी किसी ने अतिरिक्त बोला है, उसका महान परिणाम इसके सामने आया है।

रामायण और महाभारत तो इसके ज्वलंत उदाहरण है।

रामायण में शूर्पनखा,

अगर शूर्पनखा लक्ष्मण पर मोहित न होती तो लक्ष्मण से अपमानित न होती, राम से तृष्णित न होती तो तो तिरस्कार न होता। स्वयं को सर्व सुन्दरी न समझती तो अपमान अनुभवित न रहती। अपने अहंकार में भरी न होती तो रावण को सीता की सुंदरता और पाने हेतु लालायित न करती।

अगर शूर्पनखा ये सब न करती तो रामायण में रावण की मृत्यु न होती।

महाभारत में द्रोपति,

दुर्योधन के महल प्रवेश द्वार पर गिरने के बाद अगर द्रोपदी छीटाकशी न करती, दुर्योधन का उपहास न करती, अंधे का पुत्र अंधा न कहती तो पांडवो का राज्य नही जाता, वन में भटकना नहीं पड़ता और महाभारत का युद्ध नही होता।

शूर्पनखा  और द्रोपती के उपहास ने इतिहास बना दिया।

कदाचित

इसमें दोनो ही को ये नहीं पता था कि उनका बीना कुछ सोचे बोलना आगे क्या परिणाम लायेगा।

एक ने पूरा परिवार खो दिया और एक ने अपना सम्मान।

इसलिए कहता हूं कि क्या आवश्यकता है हर समय बोलने की? क्या आवश्यकता है हर बात का जवाब देने की और क्या आवश्यकता है अकारण ही प्रवचन देने की।

इस संसार में सभी मनुष्य अपने अपने भाग की बुद्धि लेकर आए हैं। उन्हें उनका उपयोग करने दीजिए। हमे बस अपनी बुद्धि का विवेकी उपयोग करना है।

जिह्वा का सही उपयोग आपको कई संकटों से बचा सकती है।

सोचिए थोड़ा...

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