नारी,
यह शब्द सुनते ही मन में एक सामान्य सी परिकल्पना यह उठाती है कि एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे सारा जीवन कर्तव्यों का भार उठाना है। जिसे अपने आस पास के सारे रिश्तों को निभाना है। जिसे परिवार और समाज के लिए ही अपना जीवन समर्पित करना है।
भारतीय समाज में नारी एक महान प्राणी है। जिसके बीना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
यदि सनातन धर्म की बात की जाए तो नारी ही जीवन है। नारी के बीना इस धरा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नारी को पूजनीय माना है। यहां तक भी कहा गया है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता"। नारी के सम्मान की बात यही खत्म नहीं होती है। सनातन धर्म ने हर वो चीज़ जो हमारा पालन करती है उसमे भी नारी तत्व को देखा है। जैसे - प्रकृति माता, धरती माता आदि।
सनातन धर्म में तो स्वयं ईश्वर को भी शक्ति के अधीन बताया है और नारी शक्ति का ही प्रतीक है। जैसे - शिव में इ की मात्रा शक्ति स्वरूप है। इसके अतिरिक्त सीताराम, राधेकृष्णा आदि।
पारिवारिक रूप में भी नारी का स्थान सर्वोच्च है। नारी जब कन्या रूप में हों तो दुर्गा है, जब विवाह योग्य हो तो लक्ष्मी है, जब माता होती है तो सरस्वती है।
सामाजिक धार्मिक रूप में भी नारी का बहुत महत्व है। कोई भी सामाजिक धार्मिक अनुष्ठान नारी के बीना अधूरा है। जैसे - कन्या पूजन, हवन में पत्नी के रूप में आदि।
ये सब कार्य सनातन धर्म में नारी को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते है।
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